देहाभिमाने गलितं विज्ञाते परमात्मनी
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधय:
परम तत्व ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है अर्थात वह अपने को शरीर न मानकर उससे भिन्न मानने है तब उस स्थिति में उसका मन जहाँ- कहीं भी जाता है , वहीँ उसे समाधि की अनुभूति होती है अर्थात वह जागृत अवस्था में ही समाधि की स्थिति में आ जाता है। उस समय उसे सांसारिक विकार नहीं घेरते वहां ही समाधि समझना चाहिए।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधय:
परम तत्व ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है अर्थात वह अपने को शरीर न मानकर उससे भिन्न मानने है तब उस स्थिति में उसका मन जहाँ- कहीं भी जाता है , वहीँ उसे समाधि की अनुभूति होती है अर्थात वह जागृत अवस्था में ही समाधि की स्थिति में आ जाता है। उस समय उसे सांसारिक विकार नहीं घेरते वहां ही समाधि समझना चाहिए।
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