Monday, November 5, 2012

देहाभिमाने         गलितं        विज्ञाते        परमात्मनी
यत्र    यत्र    मनो     याति      तत्र      तत्र      समाधय:
परम तत्व ज्ञान प्राप्त कर लेने  पर  जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है अर्थात वह अपने को शरीर न मानकर उससे  भिन्न मानने  है तब उस स्थिति में उसका मन जहाँ- कहीं भी जाता है , वहीँ  उसे  समाधि की अनुभूति होती है अर्थात वह जागृत अवस्था में ही समाधि  की स्थिति में आ जाता है। उस समय उसे सांसारिक विकार नहीं घेरते वहां ही समाधि समझना चाहिए।

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