ईप्सितम मनस: सर्वम कस्य संपाडयाते सुखम
दैवायत्तम यत: सर्वम तस्मात संतोषमाश्रयेत
किसी को भी मनचाहा सारा सुख नही मिलता .वस्तुत: सुख-दुख की प्राप्ति मनुष्य के अपने हाथ मे ना होकर कर्म के आधीन है-यह सोचकर मनुष्य को जितना भी मिलता है,उतने से ही संतोष करना चाहिए . सुख मिलने पर उन्मत्त नही होना चाहिए और दुख आने पर दुख नही करना चाहिए .
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